संत सरल गीता - अष्टादश अध्याय
१८ - मोक्ष सन्यास योग:
अर्जुन उबाच
हृषिकेश मधुसूदन | हे महाबाहु नारायण ||
तत्त्व सन्यास ओ त्यागर | जणाइ मोते दयाकर || १ ||
श्रीभगवान उबाच
सर्व कामना कर्म न्यास | मुनि ऋषि मते सन्यास ||
कर्मर फल त्याग जाण | त्याग कहन्ति विचक्षण ||
कर्मकु दोषपूर्ण बारि | त्याग उचित मनेकरि ||
कर्मर त्याग हिँ यथार्थ | केतेक मनीषिन्क मत ||
अन्य केतेक ज्ञानी मत | यज्ञ ओ दान तप व्रत ||
करणीय कर्म अटइ | त्यागर पात्र नहुअइ || २-३ ||
भरत श्रेष्ठ हे अर्जुन | त्यागर त्रिबिध वर्णन ||
यथा शास्त्र अनुमोदन | तुमकु कहुअछि शुण || ४ ||
यज्ञ क्रिया ओ तप दान | अनुचित ता’र वर्जन ||
त्याग न करिबा कारण | कर्मर पवित्रता जाण ||
एसबु कर्म आचरइ | मनीषि पवित्र हुअइ || ५ ||
निष्काम मनोभाब नेइ | पवित्र कर्म आचरइ ||
हे पार्थ कुन्तीमा नन्दन | एमन्त मोर मत जाण || ६ ||
कर्त्तब्य कर्म त्याग मत | नुहँइ आदौ युक्तियुक्त ||
मोहर बशवर्त्ति होइ | कर्तव्य कर्म जे त्यागइ ||
अर्जुन जाणिरख एइ | तामस त्याग ता’ बोलाइ || ७ ||
जेउँ कर्मटि दुःखदायी | शरीरे यंत्रणा दिअइ ||
भये एमन्त कर्म त्याग | से त्याग राजसिक भाब || ८ ||
कर्त्तव्य कर्म जे करइ | फलरु अनासक्त रही ||
निश्चय जाणिव अर्जुन | सात्त्विक त्यागर प्रमाण || ९ ||
सत्त्वसमाबिष्ट मेधावी | संशयछिन्न होइ त्यागी ||
कल्याण कर्मरे आसक्त | कठिन कर्मे अनासक्त ||
एमन्त भाब न रखइ | सात्त्विक त्यागी से बोलाइ || १० ||
सम्पूर्णरूपे कर्मत्याग | शरीर पक्षे असम्भव ||
एमन्त तत्त्व जे जाणइ | कर्म फल त्याग करइ ||
कर्मफलर त्याग जाण | प्रकृत त्यागर प्रमाण || ११ ||
इष्ट अनिष्ट मिश्र रूपे | कर्मर फल ता प्रकोपे ||
मृत्यु पश्चाते फल देइ | अत्यागी ब्यक्तिगण पाइ ||
त्याग जे करइ जाणिब | कर्म फलरु मुक्त हेब || १२ ||
सकल कर्म सिद्धि पाइँ | पांचटि कारण बोलाइ ||
पांचटि कारण वर्णित | सांख्य शास्त्रर अंतर्गत ||
शुण अर्जुन देइ मन | पंच कारणर ब्याख्यान || १३ ||
कर्म सिद्धिरे अधिष्ठान | पंचन्द्रिय आदि करण ||
प्रचेष्टा बिभिन्न प्रकार | कर्त्तार दैविक संस्कार ||
एमन्त चारोटी वर्णन | कर्त्ता हिँ पंचम कारण || १४ ||
काय मन वाक्य उद्भब | प्रत्येक कर्मर आरम्भ ||
अन्याय न्याय भेदरे | जेउँ कर्म नर आचरे ||
समस्त कर्मर निमित्त | पंच कारणरे सीमित || १५ ||
पंच कारण यदि थाइ | आत्माकु करता भाबइ ||
आत्माहिँ केवल करता | एमन्त चिन्ता मूर्खमता ||
एमन्त जे नर भाबइ | प्रकृते किछि न देखइ || १६ ||
नाहिँ जाहार अहंकार | लिप्त नाहिँ बुद्धि जाहार ||
हत्या कले मध्य काहार | हत्या नुहँइ धनुर्धर ||
कर्म बन्धने न पड़इ | निश्चित मत ए अटइ || १७ ||
ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता अर्जुन | कर्मर प्रवर्त्तक जाण ||
कर्त्ता कर्म तथा इन्द्रिय | त्रिबिध क्रियार आश्रय || १८ ||
सांख्य दर्शन अनुसारे | ज्ञान कर्म कर्त्ता गुणरे ||
तिनि प्रकार बोलि जाण | कहुछि शुण मुँ अर्जुन || १९ ||
अभिभक्त से भगवान | सर्व जीब देहे स्पुरण ||
जेउँ ज्ञान बले अर्जुन | एमन्त हुअइ दर्शन ||
से ज्ञान सात्त्विक अटइ | श्रेष्ठ ज्ञान ताहा बोलाइ || २० ||
सर्व जीब देहे अर्जुन | भिन्न भिन्न आत्मा दर्शन ||
से ज्ञान राजसिक ज्ञान | बोलि जाणिब हे अर्जुन || २१ ||
गोटिए कार्यकु अर्जुन | सबु किछि बोलि भाबिण ||
सम्पूर्ण सत्य न जाणइ | अल्प ज्ञान रे तिष्ठ रहि ||
से ज्ञान तामसिक जाण | एहा एक उदाहरण || २२ ||
फलरे आशा न रखइ | अनासक्त कर्म करइ ||
राग ओ द्वेष बिबर्जित | कर्त्तब्य कर्म कुंतिसुत ||
सात्त्विक कर्म बोलि जाण | मो’र प्रिय सखा अर्जुन || २३ ||
निज कामना पूर्त्तिपाईँ | बहु प्रयास करिथाइ ||
मनरे रखि अहंकार | कर्म करइ जेऊँ नर ||
से कर्म आडंवर पूर्ण | राजस अटइ अर्जुन || २४ ||
क्षय हिंसा ओ परिणाम | पौरुष नचिन्ति जे कर्म ||
मोहरे आरम्भ होइथाइ | से कर्म तामस अटइ || २५ ||
निरहंकारी अनासक्त | अटइ धैर्यबान पार्थ ||
सिद्धि असिद्धि समयरे | निर्विकार रूहे मनरे ||
सेहि उत्साही कर्त्ता जाण | सात्त्विक अटई अर्जुन || २६ ||
कर्म फलाकांक्षी रुहइ | बिषये अनुरक्त रहि ||
लोभी ओ हिंसा परायण | अटइ शौचाचारहीन ||
हर्ष बिषादग्रस्त थाइ | राजसी कर्त्ता से अटइ || २७ ||
आयुक्त अमार्जित जन | शठ आलस्य परायण ||
स्तब्ध दूराचारी मंथर | बिषादग्रस्त जेउँ नर ||
अशुद्ध गुणरे भूषित | तामसिक कर्त्ता कथित || २८ ||
गुण भेदरे हे अर्जुन | बुद्धि ओ धृति आदि गुण ||
तिनिभागरे बिभाजन | कहुछि मन देइ शुण || २९ ||
प्रबृत्ति निबृत्ति बिषय | कर्त्तव्य अकर्त्तव्य भय ||
अभय मोक्ष ओ बन्धन | जेऊँ बुद्धिरे हुए ज्ञान ||
सात्त्विक बुद्धि ताहा जाण | अर्जुन कुन्तीमा नन्दन || ३० ||
धर्म ओ अधर्म आदिकु | कर्त्तब्याकर्त्तब्य सबुकु ||
अयथा मने करिथाइ | से बुद्धि राजस अटइ || ३१ ||
अधर्मकु धर्म मानइ | अर्थकु बिपरीत नेइ ||
तमगुण द्वारा आवृत्त | ता’ बुद्धि होइथाए पार्थ || ३२ ||
मन प्राण ओ इन्द्रियर | क्रियाकु धारण धनुर्धर ||
निष्ठापर होइ अर्जुन | से धृति सात्त्विक बोलि जाण || ३३ ||
जेउँ धृति द्वारा अर्जुन | धर्म काम अर्थ धारण ||
करन्ति फलाकांक्षी जन | से धृति राजसिक जाण || ३४ ||
जेउँ धृति द्वारा धारण | दुर्मेधा व्यक्ति हे अर्जुन ||
बिषाद स्वप्न शोक भय | करिथाए हे धनञ्जय||
करिपारेनी ता’र त्याग | से धृति तामस जाणिब || ३५ ||
सुख मध्य तिनि प्रकार | कहुछि शुण धनुर्धर ||
अभ्यास द्वारा मनुष्यर | अन्त होइथाए दुःखर ||
सुखर उत्पन्न हुअइ | चित्त प्रसन्न होइथाइ ||
परमात्मारे स्थित मन | रहिथाए सदा अर्जुन ||
प्रथमे लागे बिषतुल्य | परे लागिथाए अमूल्य ||
से सुख अटे चिर स्थायी | सात्त्विक सुख से बोलाइ || ३६ -३७ ||
इन्द्रिय बिषय संयोग | तहिँरु सुखर उद्भव ||
अमूल्य तुल्य अनुभूत | परे बिषरे परिणत ||
से सुख अटे क्षणस्थायी | राजस सुख से बोलाइ || ३८ ||
आदि मध्य अन्ते अर्जुन | आत्माकु करे सम्मोहन ||
निद्रा आलस्य ओ प्रमाद | तहिँरु जे सुख उद्भब ||
तामस सुख से अटइ | ए मत मोहर अटइ || ३९ ||
पृथिबीरे देव लोकरे | समग्र विश्व ब्रह्मांडरे ||
एमिति केहि जणे नाहिँ | त्रिगुणु मुक्त जे अटइ || ४० ||
स्वभाबू गुणर उत्पन | गुणहिँ कर्मर कारण ||
कर्म बिभाग अनुसारे | चतुर्वर्ण मुँ सृष्टि करे ||
ब्राह्मण वैश्य ओ क्षत्रिय | शूद्रादि वर्ण धनञ्जय || ४१ |||
शम दम क्षमाशीलता | तप शौच ओ पवित्रता ||
ज्ञान विज्ञान आहरण | सरल आस्तिक सूजन ||
इत्यादि कर्म ब्राह्मणर | स्वभाबू उत्पन्न ताहार || ४२ ||
सौर्य तेज धैर्य दक्षता | पालन पोषण वीरता ||
ईश्वर भाबे रहि दान | युद्धक्षेत्रु अपलायन ||
एहि सबु गुण अर्जुन | क्षत्रिय स्वभाबु जात जाण || ४३ ||
कृषि वाणिज्य गोपालन | वैश्यकर्म अटे अर्जुन ||
परिचर्या सेवा सत्कार | कार्य होइथाइ शुद्रर || ४४ ||
निज कर्मरे लिप्त रहि | मनुष्य सिद्धि लभिथाइ ||
स्वकर्मरे लिप्त रहिण | सिद्धि किपरि मिले शुण || ४५ ||
जाहाठुँ सर्व जीब सृष्ट | जे थाए सबुठारे ब्याप्त ||
निज कर्म द्वारा अर्जुन | तांकु जे करइ पूजन ||
से नर सिद्धि लभिथाइ | निश्चित मत मोर एहि || ४६ ||
उत्तम रुपे सन्तुलित | परधर्म टि कुंतिसुत ||
स्वधर्म यदि दोषयुक्त | तथापि एहा जाण पार्थ ||
स्वधर्म अटे श्रेष्ठतर | एमन्त मत अटे मो’र ||
कर्त्तव्य कर्म जे करई | पापर भागी न हुअइ || ४७ ||
स्वकर्म यदि दोषयुक्त | तथापि त्याग अनुचित ||
जेह्ने अग्नि धूम आबृत्त | कर्म दोषरे आछादित || ४८ ||
अनासक्त बुद्धि जाहार | संयम जा मन शरीर ||
जे अटइ स्पृहा रहित | सांख्ययोग करि हे पार्थ ||
परम गति ता’कू प्राप्त | अटइ एहा मोर मत || ४९ ||
सिद्धि प्राप्त नर केमन्त | करइ परंब्रह्म प्राप्त ||
ज्ञानर अत्युच्च स्थानरे | पहंची थाए से अचिरे ||
कहुछि शुण मुँ अर्जुन | शुणिण तुमे हेब धन्य || ५० ||
विशुध्द बुद्धि युक्त होइ | आत्माकु संयम करइ ||
शब्ददि बिषय वर्जन | राग द्वेष त्याग करिण ||
एकान्त बासी होइथाइ | अलप आहार करइ ||
शरीर मन ओ बचन | संयमी योग परायण ||
बल दर्प ओ अहंकार | काम ओ क्रोध धनुर्धर ||
ए समस्त त्याग करिण | प्रशान्त चित्त हेले जाण ||
ब्रह्मत्व पाईं योग्य जन | होइथान्ति सेहि अर्जुन || ५१- ५३ ||
ब्रह्म स्वरूप प्राप्त होइ | शोचना आकांक्षा तथाइ ||
सर्व जीवे सम दर्शन | पराभक्तिरे मो’र लीन || ५४ ||
पराभक्तिरे स्थित रहि | मोर ज्ञान प्राप्त करइ ||
तत्त्वरे मोते जाणि पार्थ | मो ठारे हुअन्ति प्रविष्ट || ५५ ||
सदा सर्व कर्म करिण | मो शरणे रहि अर्जुन ||
शाश्वत नित्य ओ अव्यय | प्राप्ति से पद धनञ्जय || ५६ ||
समस्त कर्मकु अर्पण | कर मोते सदा अर्जुन ||
मो' ठारे चित्त निबेशिण | मत परायण होइण ||
सदाश्रय बुद्धि योगर | कर तुमे हे धनुर्धर || ५७ ||
मो’ठारे चित्तकु निबेश | सकल दुःख हेब नाश ||
मो’र कृपा लाभ करिब | संसारु तरिब पाण्डव ||
अहंकार योगुँ अर्जुन | यदि मो बचन न शुण ||
बिनाश होईब तुमर | निश्चय मत ए मोहर || ५८ ||
आश्रयरे अहंकारर | भाबुछ युद्ध धनुर्धर ||
युद्ध न करिबा मानस | शीघ्र होइब ता’र नाश ||
क्षत्रिय स्वभाब तुमर | बाध्य करिब युध्द कर || ५९ ||
मोहरे पड़ि हे अर्जुन | युद्धकु करुछ वारण ||
स्वभाब तुमकु तुमर | बाध्य करिब युध्द कर || ६० ||
ईश्वर जीवन्क अर्जुन | हृदे करन्ति अवस्तान ||
निज मायाशक्ति बलरे | शरीर रूपक यंत्ररे ||
समस्त जीवन्कू आवद्ध | करिण घुरान्ति पाण्डव || ६१ ||
सर्व भाबरे हे अर्जुन | निअ तुमे तान्क शरण ||
तान्क कृपारु हे भारत | शाश्वत शान्ति स्थान प्राप्त || ६२ ||
गुह्यठारु बि गुह्यतर | गुप्त ज्ञान ए धनुर्धर ||
उत्तम रुपे विश्लेषण | सम्पूर्ण मनन चिन्तन ||
करि आलोचना बिचार | ता’परे जाहा इच्छा कर || ६३ ||
अति गुप्त ए वाक्य मोर | शुण तुमे सखा मोहर ||
जेणु तुमे मो अति प्रिय | पूणि कहिबि धनञ्जय ||
तुम हित पाइँ पाण्डव | मन देइ एहा शुणिब || ६४ ||
निबेश मनकु मो ठारे | भक्ति कर मोर अचिरे ||
पूजा कर तुमे मोहर | करिण मोते नमस्कार ||
जेणु मोहर अति प्रिय | अट तुमे हे धनञ्जय ||
निश्चय कहुअछि शुण | मोते प्राप्त हेब अर्जुन || ६५ ||
सकल धर्म त्यागकरि | ता’परे तुमे धनुर्धारी ||
आश्रा निअ मोर शरण | अर्जुन भारत नन्दन ||
तुमकु सर्व पापु जाण | मुक्त करिबि मुँ अर्जुन ||
परम गति हेब प्राप्त | शोचना कर नाहिँ पार्थ || ६६ ||
एहि गुह्यतम तथ्यकु | नकहिबि अतपस्वीकु ||
कहिब नाहिँ अभक्तकु | श्रवणे अश्रद्धा ब्यक्तिकु ||
मो’ठारे दोष जे देखइ | मोते असूया करिथाइ ||
सेभलि जनन्कू अर्जुन | कहिब नाहिँ कदा जाण || ६७ ||
परम गुह्य तत्त्व ज्ञान | भक्तन्क मध्ये कुहे जाण ||
मो’र भक्तिरे लीन रहि | निरन्तर मोते पूजइ || ६८ ||
तान्करि ठारु प्रिय जन | मोर केहि नाहिँ अर्जुन ||
प्रियन्क मध्ये प्रियतर | भुबमण्डले धनुर्धर || ६९ ||
आमर कथापोकथन | जे जन करे अध्ययन ||
सेहि ज्ञान यज्ञे अर्जुन | ईष्ट पूजा मुँ पाए जाण || ७० ||
असुयाशून्य श्रद्धावान | होइकरे गीता श्रवण ||
सेहि पूण्य कर्मा साधुजन | शुभलोक प्राप्त होइण ||
मुक्त होइथान्ति अर्जुन | मो’र धामकु प्राप्त जाण || ७१ ||
एकाग्र चित्ते मो’ बचन | शुणिलकि तुमे अर्जुन ||
अज्ञानरु जात संशय | नष्ट हेला कि धनञ्जय || ७२ ||
अर्जुन उबाच
अज्ञानरु जात संशय | नष्ट हेला हे दयामय ||
आपणन्क कृपा लाभिलि | निजकु धन्य मने कलि ||
समस्त बचन पालन | करिबि मुहिँ नारायण || ७३ ||
संजय उबाच
शुण हे महात्मा राजन | सुंदर कथापोकथन ||
वासुदेव ज्ञान बचन | पचारुथान्ति जे अर्जुन ||
रोम हर्षण से कथन | शुणि उत्फूल हेला मन || ७४ ||
ब्यासदेवन्क कृपा होइ | गुह्य तत्त्व मुहिँ शुणइ ||
योगेश्वरन्क योग तत्त्व | शुणिलि मुँ ताहा प्रत्यक्ष || ७५ ||
एमन्त पवित्र कथन | बारम्बार करि स्मरण ||
रोमांच बारम्बार मन | होउछि मोर हे राजन || ७६ ||
सुन्दर श्रीकृष्णन्क रूप | दिव्य घन सेइ स्वरूप ||
स्मरण करि मुँ बिश्मित | बारंबार मुँ पुलकित || ७७ ||
जेउँठि योगेश्वर कृष्ण | धनुर्धर पार्थ अर्जुन ||
अछन्ति उपस्थित द्वय | सेठारे बिजय निश्चय || ७८ ||
मिथ्या मायार ए संसार | केवल सत्य मायाधर ||
खेलुछि खरा छाइ खेल | रक्षा कर आहे गोपाल ||
होउछि मो’र विस्मरण | दयाकर मन मोहन ||
असुर वृत्ति करे मन | शुद्धकर मधुसूदन ||
बहु जन्मर मो संस्कार | छेदन कर चक्रधर ||
मूढ़मति मुँ कृष्णदास | तुम कृपारु पीतबास ||
कलि भाषा रूपांतरण | चिन्तइ जगत कल्याण ||
लेखिबा योग्य मुँ नुहँइ | दयाकल तुमे कन्हेई ||
सर्व दोष मो क्षमा कर | दयाकर दया सागर ||
छाड़िण सबु रास्ता मुहिँ | तुम द्वारे अछि कन्हेई ||
रख तुमे वा मारिदिअ | मोते निजर करिनिअ ||
अष्टादश श्रीकृष्ण गीत | करुछि विनये समाप्त ||०||
|| ॐ तत् सत् इति श्रीमद भगवद गीतासू उपनिषद् सू
ब्रह्म बिद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संबादे मोक्ष सन्यास योग नाम अष्टादश अध्यायः || १८ ||